चाँद अपने पथ पर

दोस्तों , आज मैं लाया हूँ फिर अपनी कविता “चाँद अपने पथ पर “…….२२/०७/१९९७ को लिखी यह कविता यहाँ पहली बार प्रकाशित हो रही है ..

चाँद अपने पथ पर

रोज चाँद अपने पथ पर
रात के साये में है आता
लिए चाँदनी की चादर
धरा पे शीतलता फैलाता
मंद -२ अपनी ही लय में
चुपचाप गुजर है जाता
फिर अगली रात वही
क्रम है दोहराता
बेचारी है रात
सुख दुःख में देती है साथ
पर उसको क्यों वह दूर भगाता
क्या वह हो गया अभिमानी
या फिर है यह उसकी नादानी
एक नश्वर है तो एक है अविनाशी
है उसकी वह माता
काश उसको कोई समझाता
ऐ चाँद ! सोच दिन के डर से तू
उसी के आँचल में छुप जाता
कर “संतोष” इस दुखदायी दुनिया में
तुझको कोई तो है अपनाता

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