Environment:पर्यावरण

दोस्तों ,
आज अपनी डायरी से एक कविता जो मैंने १७/०७/१९९७ को लिखी थी ,प्रस्तुत कर रहा हूँ ,शीर्षक है-“पर्यावरण “

उस उम्र के पड़ाव पर जो भाव आये थे उन को डायरी के पन्नो में तो उतार दिया था मैंने परन्तु अभावो के कारण उन्ही पन्नो में कई कविताये कहीं न कहीं सिमटी रह गयी थी ..यदि आपका आशीर्वाद रहा तो उन पन्नो को ,उन कविताओ को आपके समक्ष रखता रहूँगा…..

 

आखिरी मौसम है संभल जाओ ,

नहीं कुछ और तो एक एक पेड़ लगाओ ,

होने दो मत बर्बाद हँसी गुलशन को

बचाकर पर्यावरण ,

करो  आबाद गुलशन को ,

पीढियां आएँगी हसेंगी हमपर

सोचो क्या दे रहे हो

क्यों बढ़ाते हो उलझन को ,

एक दिन ऐसा आएगा

नष्ट दुनिया हो जाएगी

हमारी संस्कृति सभ्यता

सब अनंत शून्य में खो जाएगी

मत सजाओ इसे प्रदुषण से

बचा लो आज

इसे फिर खर -दूषण से

मिलेगा तुम को संतोष इसे बचाके

मिलेगा जीवन पेड़ लगाके

उठो समय  न व्यर्थ गँवाओ

बगिया में एक पेड़ लगाओ

बगिया में एक पेड़ लगाओ  II

Santosh Pandey

www.santoshpandey.in

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दोस्तों , उस वक्त मेरी उम्र के अनुसार जो भाव आये वही इस कविता में प्रस्तुत है यदि आप को पसंद आये तो कमेंट बॉक्स में लिखें .

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