जागती आँखों के वो सपने

दोस्तों , आज ही के दिन मैंने इस वेबसाइट www.santoshpandey.in नीव रखी थी,हालांकि लेखन का शौक पहले से था पर जूनून अब बन गया है ,कभी उन रचनाओं को प्लेटफॉर्म नहीं मिला था  तो आज ही के दिन दिल से शुरुआत कर दी थी जब तारीख थी 31/12/2013 .आज इस वेबसाइट का पहला बर्थडे मना रहा हूँ

इसी  क्रम में 16 जून 2003 को लिखी, एक मजदुर जो इलाहाबाद में मेरे हॉस्टल के सामने सुबह हर रोज दिखता  था ,सड़क के किनारे उसको हर रोज मैं “चावल चटनी और एक मिर्च ” खाते हुए देखता था, से प्रेरित  तब इस  कविता ने जन्म लिया था ..आज वही पेश है

“जागती आँखों के वो सपने”

सपने उन आँखो के

जो रोज जीते-मरते हैं ,

जो उर की नहीं

पेट की भूख से जलते हैं I

आसमाँ जैसा छत सिर पर

धरती सेज है फूलों की ,

आखों के झरते झरनो से

उगते हैं पेड़ बबूलों के

जिनकी दुखों की डेहरी में

गिन कर सुख मचलते हैं

अलसायी पीली आखों में

कितने सपने रोज बिखरतें हैं I

आंसूं में बहते रहते

वो सपने गालों पर

सज जाते हैं सारे

लम्बी उन कतारों पर

कठिन जीवन की पगडण्डी में

जो श्रम की बलिवेदी पर चढ़ते हैं

जागती आँखों के वो सपने

जाने कितनी आँखों से

हर रोज गुजरते हैंI

 

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Santosh Pandey

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