जब जागा था तब सोया था

दोस्तों ,
आज की कविता है………

“जब जागा था तब सोया था”

जब जागा था तब सोया था ….
जब उठा तो रोया था
रिश्तो की पहेली में
उलझने से पहले
जब खुद से मिला तो खोया था….
बंदिशे तब भी थी
अब भी हैं
तन्हाई तब भी थी
अब भी है
बस यादों का समंदर लिए
हर रोज
हर पल
पलकों पर ढोया था….
अधूरे ख्वाब तब भी थे
अब भी हैं
बस वक़्त की बस्ती में
एक दिन “संतोष”
जब जागा था तब खोया था….
जब उठा तो रोया था …..

santosh

Santosh Pandey

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