Today’s context:आज का सन्दर्भ

दोस्तों ,आज पुरानी यादें ताजा हो आयीं जब पुरानी डायरी के पन्ने पलट रहा था ….उन्ही पन्नों के बीच एक पीला पन्ना मिला जिस पर मैंने कभी कलम चलायी थी …..बात उन दिनों की है जब मैं कक्षा नौवी का छात्र था ….आज पेश है वही पन्ना ….वही चिट्ठा….

तब से डायरी के पन्नो के बीच डरा सहमा पड़ा हुआ था ..आज आजाद कर रहा हूँ क्यूंकि आज इसे भी हक़ है प्रकाशित होने का …कल जो अभावों के बीच कभी बाहर नहीं निकल पाया …

 

पाठको ..आपसे अनुरोध है इस चिट्ठे को जरूर पढ़ें और अपने विचार कमेंट बॉक्स में साझा करें..आपसे आशीर्वाद देने की गुजारिश के साथ पेश है अपने वास्तविक छायाचित्र (फोटो) के साथ  …..

 

” आज जब देश विषम परिस्थतियों से गुजर रहा है तो वहीं समाज को दो वर्ग “नेता ” और “अभिनेता ” अपनी ओर आकर्षित कर रहें हैं ..नीति ,नेता तथा अभिनेता तीनो आज समाज के पर्याय बन चुके हैं .तथा वर्तमान युग में नेता और अभिनेता दो ही विशिष्ट वर्ग प्रतीत हो रहें हैं ..एक देश को आगे ले जा रहा है और दूसरा समाज को , किन्तु पता नहीं कहाँ ?

एक का शास्त्र है “नीति ” तथा दूसरे की “कला “….आज समाज इन्ही दोनों का अंध भक्त है ..

दोनों का एक विशेष गुण है “अभिनय “…एक नैतिक अभिनय प्रस्तुत करता है तो दूसरा आंगिक अभिनय ..एक मंच पर अभिनय प्रस्तुत करता है तो दूसरा रंगमंच पर …अवसरनुकूल भाव दोनों के मुखमंडल पर दर्शनीय होता है …कला के बारे में विवाद रहा है की कला कला के लिए है या जीवन के लिए …इन्होने इस विवाद को स्पष्ट कर दिया है अभिनय या कला , कला और जीवन दोनों के लिए है …क्यूंकि इसी कला से ही जीवन के सर्वसाधन को इन्होने उपलब्ध किया है इसके उदाहरण आज कहीं किसी भी पत्रिका और पत्रों में उपलब्ध है .

आज नेता और अभिनेता दोनों ही वर्ग संतुष्ट नहीं है स्वयं से …तभी तो नेता अभिनेता बनना चाहता है और अभिनेता नेता …

प्रश्न यह उठता है दोनों में सर्वश्रेष्ठ कौन है लेकिन तुलना करके किसी एक को कम बताना उनकी अवमानना होगी ..दोनों महत्वपूर्ण है तभी तो इनकी छींक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती है और उनका साक्षात्कार नीति बन जाती है …

दोनों का लोक न्यारा है एक का इन्द्रलोक दूसरे का विष्णुलोक …आधुनिक समाज भी इन लोकों में जाने के लिए तप करता ही जा रहा है ..

न चिंता है समाज की न देश के भविष्य की …

पर आज अभिनेता से नेता बनने की प्रवृत्ति बढ़ी है तो बेचारे नेताओं पर तरस आती है की वे क्या करें ..वे तो अभिनेता बनने से रहे …

“धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का “…..

किन्तु इनके रूप परिवर्तन से भक्तों को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है …की उनकी आराधना किस रूप में करें …

यदि तुलसी जैसे भक्त हो जाएँ तो राम को रामत्व पर ठीके रहने के लिए बाध्य कर सकतें हैं ..वैसे भगवान रूप परिवर्तन लीला दिखने के लिए ही करते हैं ..आज का सन्दर्भ…  धोबी का कुत्ता…………

Santosh Pandey

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3 comments

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