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महाशिवरात्रि 2019 पूजा विधि व्रत कथा हिंदी में भगवान शिव के मंत्र

दोस्तों ,आगामी 4 फरवरी को भोले का पर्व महाशिवरात्रि मनाया जाएगा।  इस बार की महाशिवरात्रि सोमवार के दिन पड़ने से और भी खास है। प्रयागराज में चल रहे कुंभ में भी इसी दिन आखिरी शाही स्नान होगा

हिंदू पुराणों में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के लिए कोई एक नहीं बल्कि कई वजहें बताई गई हैं. किसी कथा में महाशिवरात्रि को भगवान शिव के जन्म का दिन बताया गया है. मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन ही भगवान शिव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे. इसी वजह से इस दिन शिवलिंग की खास पूजा की जाती है. वहीं, दूसरी प्रचलित कथा के मुताबिक ब्रह्मा ने महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन ही शंकर भगवान का रुद्र रूप का अवतरण किया था. इन दोनों कथाओं से अलग कई स्थानों पर मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की शादी हुई थी.

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनेक मंत्रों की रचना की गई है, लेकिन कुछ मंत्र ऐसे हैं, जिनके जाप से महादेव बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। इन मंत्रों का जाप महाशिवरात्रि (4 मार्च, सोमवार) पर किया जाए तो बहुत ही शुभ रहता है। ये मंत्र इस प्रकार हैं…

1. ऊं नमः शिवाय

2. ऊं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

3. ऊं तत्पुरुषाय विदमहे, महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।

4. दर्शनं बिल्वपत्रस्य स्पर्शनं पापनाशनम् |
अघोरपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ||
(शिवलिंग पर बिल्व पत्र चढ़ाते समय ये मंत्र बोलना चाहिए)

कैसे करें मंत्रों का जाप ?
1. महाशिवरात्रि की सुबह स्नान आदि करने के बाद किसी मंदिर में या घर पर ही शिवजी की पूजा करें।
2. शिवजी के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
3. कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से इनमें से किसी एक मंत्र का जाप करें।
4. कम से कम 5 माला जाप अवश्य करें। इसके बाद शिवजी की आरती करें।

साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है. हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन आने वाली शिवरात्रि को सिर्फ शिवरात्रि कहा जाता है. लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन आने वाले शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है. इसे कुछ लोग सबसे बड़ी शिवरात्रि के नाम से भी जानते हैं.

महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त:
शुभ मुहूर्त शुरु – 4 मार्च 2019 शाम 04:28
शुभ मुहूर्त समाप्त – 5 मार्च 2019 सुबह 07:07

शिवलिंग के अभिषेक के लिए शहद मिला हुआ दूध या पानी। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर सिंदूर लगाएं। धूप और दीपक जलाएं। बेल और पान के पत्ते चढ़ाएं। अनाज और फल चढ़ाएं। इसके बाद ‘ओम नम: शिवाय’ का जाप करें।

कहानी शिवरात्रि की

एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को सबसे सरल व्रत-पूजन का उदाहरण देते हुए एक शिकारी की कथा सुनाई. इस कथा के अनुसार चित्रभानु नाम का एक शिकारी था, वो पशुओं की हत्या कर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था. उस पर एक साहूकार का ऋण था, जिसे समय पर ना चुकाने की वजह से एक दिन साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया था. संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी. शिवमठ में शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना और कथा सनाई जा रही थी, जिसे वो बंदी शिकारी भी सुन रहा था. शाम होते ही वो साहूकार शिकारी के पास आया और ऋण चुकाने की बात करने लगा. इस पर शिकारी ने साहूकार से कर्ज चुकाने की बात कही.

अगले दिन शिकारी फिर शिकार पर निकला. इस बीच उसे बेल का पेड़ दिखा. रात से भूखा शिकारी बेल पत्थर तोड़ने का रास्ता बनाने लगा. इस दौरान उसे मालूम नहीं था कि पेड़ के नीचे शिवलिंग बना हुआ है जो बेल के पत्थरों से ढका हुआ था. शिकार के लिए बैठने की जगह बनाने के लिए वो टहनियां तोड़ने लगा, जो संयोगवश शिवलिंग पर जा गिरीं. इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए.

इस दौरान उस पेड़ के पास से एक-एक कर तीन मृगी (हिरणी) गुज़रीं. पहली गर्भ से थी, जिसने शिकारी से कहा जैसे ही वह प्रसव करेगी खुद ही उसके समक्ष आ जाएगी. अभी मारकर वो एक नहीं बल्कि दो जानें लेगा. शिकारी मान गया. इसी तरह दूसरी मृग ने भी कहा कि वो अपने प्रिय को खोज रही है. जैसे ही उसके उसका प्रिय मिल जाएगा वो खुद ही शिकारी के पास आ जाएगी. इसी तरह तीसरी मृग भी अपने बच्चों के साथ जंगलों में आई. उसने भी शिकारी से उसे ना मारने को कहा. वो बोली कि अपने बच्चों को इनके पिता के पास छोड़कर वो वापस शिकारी के पास आ जाएगी.

इस तरह तीनों मृगी पर शिकारी को दया आई और उन्हें छोड़ दिया, लेकिन शिकारी को अपने बच्चों की याद आई कि वो भी उसकी प्रतिक्षा कर रहे हैं. तब उसके फैसला किया वो इस बार वो किसी पर दया नही करेगा. इस बार उसे मृग दिखा. जैसे ही शिकारी ने धनुष की प्रत्यंचा खींची मृग बोला – यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों और छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े. मैं उन मृगियों का पति हूं. यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो. मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा.

ये सब सुन शिकारी ने अपना धनुष छोड़ा और पूरी कहानी मृग को सनाई. पूरे दिन से भूखा, रात की शिव कथा और शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ाने के बाद शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया. उसमें भगवद् शक्ति का वास हुआ. थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके. लेकिन जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता और प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई.

शिकारी ने मृग के परिवार को न मारकर अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया. देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे. इस घटना के बाद शिकारी और पूरे मृग परिवार को मोक्ष की प्राप्ति हुई.

एक दूसरी कथा के अनुसार

अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन हुआ. लेकिन इस अमृत से पहले कालकूट नाम का विष भी सागर से निकला. ये विष इतना खतरनाक था कि इससे पूरा ब्रह्मांड नष्ट किया जा सकता था. लेकिन इसे सिर्फ भगवान शिव ही नष्ट कर सकते थे. तब भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था. इससे उनका कंठ (गला) नीला हो गया. इस घटना के बाद से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ा. मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा विष पीकर पूरे संसार को इससे बचाने की इस घटना के उपलक्ष में ही महाशिवरात्रि मनाई जाती है.

Santosh Pandey
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