परिवर्तन से सफलता

परिवर्तन से सफलता

Parivartan se saflata

दोस्तों , जैसा आप पिछले पोस्ट में पढ़ चुके हैं परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है ,यह अपने आप होता है और शाश्वत सत्य भी है परन्तु प्रकृति द्वारा किया जाने वाला परिवर्तन स्वतः होता है परन्तु विकास की प्रक्रिया में यह व्यक्तियों पर लागू नहीं होता  है इसका मतलब हम चाहे तो परिवर्तन अपनी क्षमता से अपने लिए भी कर सकता हैं जीवन महत्वपूर्ण है किन्तु उससे भी महत्वपूर्ण है सफल होना … अर्थात परिवर्तन से सफलता  ?

सफलता द्योतक है आपके समाज में समाज द्वारा दिया गया महत्वपूर्ण स्थान जो आपकी क्षमता के अनुसार आपको मिलता है कई बार आप ले लेते हैं ….सफलता का पैमाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग होता है उसी प्रकार परिवर्तन भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसकी क्षमता के अनुसार अलग अलग होगी …

सफलता के लिए तीन प्रकार की शक्तियां अहम हैं

इच्छाशक्ति

संकल्पशक्ति

एकाग्रता की शक्ति

 ये तीन शक्तियां कम या अधिक मात्रा में हर व्यक्ति के पास होती है। कोई भी इनसे हीन नहीं है। सवाल इन्हें जागृत करके जीवनशैली बनाने का है।

इच्छा शक्ति आपके भीतर समायी होती है परन्तु आप अंदर की आवाज को सुनकर भी उसे नकारते रहते हैं ..आलस यहाँ बड़ा मायने रखता है आपको जंजीरों में जकड के रखता है इसके छुटकारा पाना है तो ५ सेकंड वाला नियम अपना लीजिये ..( इसे आप मेरे दूसरे लेख में भी पढ़ सकते हैं )

यहाँ मैं बात करूँगा इच्छाशक्ति की …सफल होने की इच्छा होनी चाहिए और इच्छा भी बलवती हो तो मजा ही कुछ और होगा …कुछ पाने की इच्छा या कुछ करने की इच्छा …यहाँ बता दू आपके शहर में जो गुंडे बदमाश होते हैं उनमे यह गुण बड़ा ही बलवान होता है बस नेगटिव होता है इसी को आपको पॉजिटिव रखना है …

कुछ लोग संकल्प से घबराते हैं। उन्हें यह ज्ञान ही नहीं कि संकल्प के बिना किसी का विकास नहीं हो सकता। उपनिषद में कहा गया है-

“संकल्पजा सृष्टिः”

कोई भी सृष्टि हुई है तो संकल्प से ही हुई है। संकल्प मदद करता है आपकी इच्छाशक्ति को सुदृढ़ बनाने में … कभी आप PURI मंदिर जाएँ  या  माँ विंध्यवासिनी  मंदिर जाएँ जहाँ पण्डे  आपको सोचने का समय दिए बिना झट से हाथ में पुष्प थमा के संकल्प करा  देते  हैं और  आप 2100 या 1100 या 501 देने के लिए बिना मन के राजी हो जाते है उनको देने के लिए क्यूंकि आपको डर होता है की भगवान कहीं रुष्ट न हो जाएँ …यही वाला संकल्प आपको बिना डर के आ जाये तो आप सफल हो सकते हैं  जब नई फैक्टरी बैठाते हैं या सीए बनने की सोचते हैं, डॉक्टर वगैरह हम नया मकान बनवाते हैं, तो इसके पीछे हमारा दीर्घकालिक चिंतन होता है। चिंतन के बाद उसके लिए संकल्पित होते हैं, तब कहीं जाकर संकल्प चरितार्थ होता है। जब संकल्प चरितार्थ होता है तो सफलता के द्वार खुल जाते हैं

कोई भी सफलता एकाएक नहीं मिलती। संकल्पों से जुड़ने वाले व्यक्ति जो संकल्प लेते हैं, उसमें सफलता के लिए उसका वे प्रतिदिन पुनरावर्तन करते हैं। प्रतिदिन उसे दोहराते हैं। जहां स्वीकृत संकल्पों का पालन नहीं होता, वहां चारित्रिक न्यूनता या शिथिलता आती है और सफलता भी संदिग्ध हो जाती है। संकल्प प्रारंभ में गीली मिट्टी का लोंदा होता है। उसे घड़ा बनाकर तुरंत उसमें पानी नहीं भरा जा सकता। पानी तभी उसमें टिकेगा, जब घड़ा पक जाएगा। तो आपको अपना घड़ा पकने देना है तब जाके पानी डालना हैं

श्रम, संकल्प और सफलता एक दूसरे से जुड़े हैं। श्रम हो और संकल्प हो तो सफलता सुनिश्चित हो जाती है। इसमें प्रोत्साहन का भी बड़ा योग होता है। संकल्प को सिद्धि तक पहुंचाने हेतु पूरे मन से तैयार होना होता है, उसके अनुकूल माहौल भी बनाना होता है। व्यक्ति में इसके लिए स्वयं को बदलने की तैयारी भी आवश्यक है।

व्यक्ति स्वयं में बदलाव कैसे लाए?  नए परिवर्तन की नई दिशाओं का उद्घाटन कैसे किया जा सकता है? जो व्यक्ति प्रत्येक स्थिति में संतुलन बनाए रख सकता है, वह नित्य नए सृजन की क्षमता को बढ़ाता हुआ अप्राप्य को प्राप्त कर लेता है। नेपोलियन हिल ने सुझाव दिया कि हमारा अंतिम लक्ष्य अपने आपको महान बनाना होना चाहिए, लेकिन इस अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने से पहले हमें महान लोगों का अनुकरण करना चाहिए।

अनुकरण हमेशा महान व्यक्तियों के होने चाहिए परन्तु नक़ल नहीं करना …बड़ा ही बारीक़ सा अंतर है यहाँ क्यूंकि आप संसार के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं तो आप  दूसरे की नक़ल क्यों करेंगे ? सिर्फ  उनके मार्ग का अनुकरण करना है उनसे सीखना है उस पथ में आने वाले कष्टों का निराकरण …

संस्कृत में एक मंत्र है-‘अहं ब्रह्म अस्मि’ यानी मैं ईश्वर हूं। हम व्यर्थ उसे बाहर मूर्तियों, ग्रंथों, पूजा-स्थलों में ढूंढ़ते रहते हैं। हमारा ही सर्वश्रेष्ठ रूप ईश्वर है। सो हमें अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को हासिल करने की कोशिश करनी है। दूसरे शब्दों में महानता को हासिल करने का पहला कदम है स्वयं का सम्मान करना सीखना। सम्मान करना और पाना दोनों ही आना चाहिए ..आप सिर्फ सम्मान देने के लिए ही नहीं बने हैं बल्कि इसपर आपका भी हक़ है ..इन तरीकों को ढूढ़ना है और उस पर बने रहना है.

संकल्प बड़ी शक्ति है और इससे बड़ा परिवर्तन हो सकता है। रूमी ने कहा है- ‘कोई दर्पण फिर कभी लोहा नहीं बना, कोई रोटी फिर कभी गेहूं नहीं बनी, कोई पका हुआ अंगूर फिर कभी खट्टा फल नहीं बना।’ इसलिए परिवर्तन के बुरे नतीजों के बारे में आशंकित न हों। बुरा होना कोई बुरी बात नहीं है परन्तु उस निराशा से बाहर निकलना आना  चाहिए … इसलिए खुद रोशनी बनें और दूसरों को भी प्रकाशित करें।

एकाग्रता कार्य में होना ,आपके पथ को आसान बनाएगा …आप अपने पथ से न भटके यह निश्चित करना ही एकाग्रता है ..जहाँ तक मैं समझता हूँ सफलता की रह उतनी कठिन नहीं है जितना हम समझते हैं  ….

आज यही विराम देता हूँ अगले  पोस्ट  में क्या परिवर्तन किया जाये इस विषय पर चर्चा  करेंगे , आपके व्यक्तिक विकास की चर्चा करेंगे. आप के लिए कोई AchhiKhabar लाएंगे . यदि आपको मेरे विचार अच्छे लगे तो शेयर अवश्य कीजिये …मुझको पढ़ने के लिए धन्यवाद….

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