Common Man Vs Common Man :आम आदमी Vs आम आदमी

Common man  अर्थात आम आदमी  widely used  शब्द हैहाल में यह शब्द भारतीय राजनीती में छा गया हैहर कोई आम आदमी बनना या दिखना चाह रहा है ,

दोस्तों आज देखेंगे एक आम आदमी क्या करना चाहता है ?.

एक आम आदमी क्या कर सकता है ?..

इसका ताजा उदाहरण

अरविन्द केजरीवाल है  इस आम आदमी ने भारतीय राजनीती में उथल पुथल मचा रखा  है ..

इस आम आदमी ने सभी पार्टियो नेताओ के सोचने समझने का नजरिया बदल दिया हैप्रत्येक पार्टी या नेता इस आम आदमी से कुछ सीखने कि हिदायते देते नजर रहें हैंहालाकि विरोध   प्रबलतम रूप में है

इन सबसे परे भारतीय आम आदमी ने इस आम आदमी को राजनीती का विकल्प मान लिया है इसका Example Delhi  तो है ही हर जगह कमोवेश यही नजारा है ….

यहाँ विषय वस्तु यह है कि यह आम आदमी मेरा आशय अरविन्द केजरीवाल से नहीं भारतीय आम आदमी से है आखिर क्या जरुरत आन पड़ी कि स्वयं को खास कहने वाले तथाकथित नेताओ से मोरचा लेना पड़ रहा है  ….

आम आदमी क्यों सोचने लगा है कि खास आदमी अब उसका नहीं रहागहराई से सोचने पर लगता है  आदमी ही भ्रष्टाचार का केंद्र है चाहे वह आम हो या खास

आप और हम भलीभाति जानते हैं कि असल जिंदगी में कोई भी काम सरकारी तंत्र द्वारा बिना पैसे के लेनदेन के नहीं होता हैअथवा इतना लेट कर दिया जाता है कि आदमी देने को मजबूर हो जाता है

वस्तुतः यह करता कौन है ? यही अपना आदमी ….जो एक दिन आम आदमी था ..कुर्सी के मिलने के बाद खुद को वह खास समझ बैठता है ….

अर्थात भ्र्ष्टाचार कि लड़ाई आम आदमी Vs खास आदमी नहीं बल्कि आम आदमी Vs आम आदमी ही हैगणित और हिंदी  के नियमो के अनुसार आम आदमी ही इसे खत्म कर पायेगा ….अतः हमे समझना होगा कि आम आदमी किसको बदलने कि बात कर रहा हैये लड़ाई किसकी है और किससे है …?

उन चंद खास आदमियों  से या स्वयं से ….

क्या जनलोकपाल बिल आने से आम आदमी अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर लेगादेश को भ्रस्टाचार  मुक्त कर लेगानहीं ऐसा नहीं है ….यह इस तरह असम्भव है

आम आदमी जब तक खास बनने कि कोशिश करता रहेगा यह लड़ाई अधूरी है ….इसके लिए बड़े बदलावों कि आवश्यकता है खुद के अंदर ..उस आम आदमी के अंदर ……जय हो    

santosh     

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Common Man.....

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