Think Big

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दोस्तों ,आज वैचारिक मतभेदों के बीच लेखनी क्या लिखना चाहती है पता ही नहीं चलता ,यूँ तो बारिशों का मौसम है पर लिखने को कुछ ऐसा नहीं है की मन पर आपके बारिश का प्रभाव दर्शा सके ..आखिर क्या बताऊँ जो आप पढ़ना ही नहीं चाहते  ..पढ़ते हैं तो कुछ सोचना नहीं चाहते ..सोचते हैं तो कुछ करना नहीं चाहते …आप ने कभी देखा है किसी मर्सेडीज़ पर लिखा ” बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला ” शायद नहीं कम से कम मैंने तो नहीं देखा है …अमिताभ बच्चन ,शाहरुख खान ,सलमान खान ,कटरीना कैफ , और तो और अम्बानी के घर पर काली हांड़ी ….हाँ रिक्शे के पीछे ,ऑटो के पीछे आपने हर जगह देखा होगा ….क्यों ? आपने कभी सोचा उस रिक्शे ,ऑटो को देख के की काश वो ऑटो /रिक्शा मेरा हो जाता ….नहीं न ?

इसके पीछे बड़ा ही दुर्लभ इतिहास है आज आप को बताता ही हूँ ….पढ़ते पढ़ते थक गए हो तो अंदर चाय मागां लीजिये   या तोडा कंप्यूटर /मोबाइल स्क्रीन से इधर उधर आखे घुमा लीजिये ..जानता हूँ आप इस लेख तक पहुंचे हैं तो बड़ी देर से कोशिश कुछ और ही कर रहे होंगे ..यूँ तो कोई पढ़ने में इंटरेस्ट नहीं होता ..लेकिन आगे आप जरूर पढ़ेंगे ..क्यों जानते हैं ?

      मैं  बताता हूँ क्यों ? क्यूंकि आप बचपन से यही पढ़ते आ रहे हैं की थोड़ा है थोड़े की जरुरत है ..हैं न ? अरे हम मंदिर जाते है मस्जिद जाते हैं गुरूद्वारे जाते है चर्च  जाते हैं और क्या मांगते हैं ?

 हे भगवन! दाल रोटी दे देना ,काम थोड़ा चल जाये , बस !   सही है न ?

मैं पूछता हूँ क्यों ?   ऑटो में नजर लग जाती है रिक्शे में नजर लग जाती है ..लेकिन मर्सेडीज़ में नहीं लगती है क्यों ?

शहर की झुग्गी बस्ती में एक दिन जाना आप , बाहर गेट पर तरह तरह के नजरबट्टू लगे होंगे लेकिन बेचारे अम्बानी के घर पर आप को नहीं मिलेगा

आप को समझ में आ गया होगा अब तक …ये नजर नहीं छोटी सोच का परिणाम है …हम बचपन से ही इस माहौल में पले बढे की बस थोड़ा चाहिए ..क्यों नहीं पूरा ,ज्यादा चाहिए …कभी सोचा आपने ..की इतनी छोटी सोच के साथ अपने जीवन में क्या कर लोगे ? कितना पा लोगे ?

अरे कम से कम बड़ा सोचो तो सही ……

ओलम्पिक में तीरंदाज को निशाना लगाते कभी देखा है ?

आप को समझ में आ गया होगा अब तक …ये नजर नहीं छोटी सोच का परिणाम है …हम बचपन से ही इस माहौल में पले बढे की बस थोड़ा चाहिए ..क्यों नहीं पूरा ,ज्यादा चाहिए …कभी सोचा आपने ..की इतनी छोटी सोच के साथ अपने जीवन में क्या कर लोगे ? कितना पा लोगे ?

अरे कम से कम बड़ा सोचो तो सही ……

ओलम्पिक में तीरंदाज को निशाना लगाते कभी देखा है ?

वह हमेशा अपने टारगेट  से थोड़ा ऊपर निशाना लगाता है तभी तीर टारगेट पर लग जाता है यानि थोड़ा ऊपर अर्थात जितना चाहिए उससे थोड़ा  ज्यादा ….है की नहीं ?

थोड़ी देर सोचो यार ! अपने आप में झाकों ..कोई तो खिड़की खुली दिख जाएगी …न दिखे तो सुबह उठो कहीं घर से बाहर निकल जाओ

एकांत में थोड़ी देर के लिए …..नौकरी कर रहे हो तो एक दिन chhutti le lo ..अरे एक दिन का nuksaan ही सही ….जाओ तो सही ?

मुझे पता है आपके मन में इस समय कई अंतर्द्वंद एक साथ चल रहा होगा ..उसमे कोई एक मुझे भी गलत दिखा रहा होगा …इस लेख को आगे पढ़ने से रोक रहा होगा …..है न ?

मत  रोको ..पढ़ने  से ..सोचने   से  और करने से …….ये ही वह परिस्थिति  है जहाँ आप रुक जाओगे ….

पर मेरा विश्वास  कहता है की आज ….आप नहीं रुकोगे ………सोचोगे ….और   करोगे ……वही जो आप करना चाहते हो .. उसके लिए जो आप पाना या बनना चाहते हो …….   यहाँ मैं आपको ये नहीं बताऊंगा की स्वामी विवेकानंद ने कहा …उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत ….

..लेकिन ये जरूर बताऊंगा की ऊपर पढ़े हुए लाइनों को अपने जीवन में उतारोगे  ..तो एक दिन सफलता कदम चूमेगी ….

     Copyright @Santosh Pandey

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